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गौतम बुद्ध ,गौतम बुद्ध की जीवनी, गौतम बुद्ध का जीवन परिचय ,Biography of Gautama Buddha in Hindi Jivani

 गौतम बुद्ध एक प्रसिद्ध धर्मगुरु थे जिन्होंने अपने जीवन के दौरान बौद्ध धर्म की स्थापना की थी। उन्होंने मगध साम्राज्य के शासक सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्म लिया था और उनका जन्म स्थान नेपाल और बिहार के समीप कपिलवस्तु नामक शहर था। उन्होंने अपने जीवन के दौरान अनेक उन्नति की और बौद्ध धर्म के मूल तत्वों को प्रचारित किया जो अब दक्षिण एशिया के कई देशों में अनुयायियों द्वारा अनुसरण किए जाते हैं।



गौतम बुद्ध का जन्म:

गौतम बुद्ध (Gautama Buddha) का जन्म कपिलवस्तु नामक गांव में हुआ था। यह गांव नेपाल और भारत के समीप स्थित है। उनके पिता का नाम शुद्धोधन था और माता का नाम माया था। उनका जन्म सन् 563 ई. पू. वर्ष माना जाता है। उनका जन्म अमूल्य रत्न छत्त्रिय वंश के राजकुमार के रूप में हुआ था। उन्होंने विवाह किया था और उनकी पत्नी का नाम यशोधरा था। उनके जीवन का महत्वपूर्ण भाग उनके त्यागपत्र (renunciation) के बाद से शुरू होता है, जब उन्होंने संसार से त्यागपत्र ले लिया था और बौद्ध धर्म की शिक्षाओं को खोजने के लिए यात्रा पर निकल गए थे।सिद्धार्थ का मन न से ही करुणा और दया का स्रोत था। उनके आरंभिक जीवन की अनेक घटनाओं से पता चलता है कि वे एक दयालु और संवेदनशील व्यक्ति थे। जब घोड़े दौड़ते थे और उनके मुँह से झाग निकलती थी, तब सिद्धार्थ उन्हें थका जानकर वहीं रोक देते थे और जीती हुई बाजी हार जाते थे। खेल में भी सिद्धार्थ को खुद हार जाना पसंद था क्योंकि किसी को हराना और किसी का दुःखी होना उन्हें अच्छा नहीं लगता था। सिद्धार्थ ने अपने चचेरे भाई देवदत्त द्वारा तीर से घायल किए गए हंस की सहायता की और उसके प्राणों की रक्षा की।

गौतम बुद्ध की शिक्षा:

गौतम बुद्ध ने अपनी शिक्षाएं अपने अनुभवों और ध्यान के माध्यम से प्राप्त की थीं।

उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों से बौद्ध धर्म की शिक्षाएं निकाली थीं जो उनके अनुयायियों द्वारा अनुसरण की जाती हैं।

गौतम बुद्ध ने अपने जीवन के दौरान धर्म और ध्यान के माध्यम से अपनी शिक्षाएं प्राप्त की। उन्होंने अपने जीवन के विभिन्न पहलुओं में अनुभव किए जैसे अध्ययन, समझदारी, संयम, ध्यान आदि और उनके अनुभवों से वे महत्वपूर्ण शिक्षाएं निकालते रहे।

उन्होंने अपने समय में चार वेदों और उपनिषदों के विरोधी धर्म के रूप में बौद्ध धर्म की शिक्षाओं को प्रचारित किया था। गौतम बुद्ध की सिखायी गई शिक्षाएं उनके अनुभवों और ध्यान के माध्यम से प्राप्त की गई थीं जो उनके अनुयायियों द्वारा सम्मानित की जाती हैं।सिद्धार्थ ने अपने गुरु विश्वामित्र के निर्देशन में वेद और उपनिषद्‌ का अध्ययन किया था, लेकिन उन्होंने राजकाज और युद्ध-विद्या की भी शिक्षा ली थी।

सिद्धार्थ कुश्ती, घुड़दौड़, तीर-कमान और रथ हाँकने में बहुत माहिर थे और उनकी इस कौशल को कोई भी उनके सामने नहीं था।


गौतम बुद्ध का विवाह:

गौतम बुद्ध का विवाह शाक्य कुल की राजकुमारी यशोधरा से किया था। उनकी शादी लुम्बिनी में हुई थी।गौतम बुद्ध की शादी के बाद उन्हें एक पुत्र का जन्म हुआ था जिसका नाम राहुल था। इसके बाद गौतम बुद्ध ने अपने जीवन को ध्यान एवं तपस्या में लगा दिया था और अपनी शिक्षाओं को दुनिया के साथ साझा करना शुरू कर दिया था।

गौतम बुद्ध का महाभिनिष्क्रमण :

गौतम बुद्ध का महाभिनिष्क्रमण  उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण घटना था, जिसमें वे अपने राज्य और संसारिक सुख से विरक्त होकर संन्यास ले लिया था।

गौतम बुद्ध ने इस निर्धारित कर लिया था कि उन्हें संसार से विरक्त होना है और मोक्ष की प्राप्ति के लिए उन्हें संसार से अलग होना चाहिए। उनके जीवन में अध्ययन, तपस्या और ध्यान के माध्यम से कुछ समय बिताने के बाद, उन्होंने अपने राज्य की सम्प्रभुता को छोड़ने का निर्णय लिया था।

महाभिनिष्क्रमण के दौरान, गौतम बुद्ध ने अपने परिवार, सम्प्रदाय और संसारिक सुखों से विदाई ली थी और उन्होंने वनवास का निर्धारण किया था जहां वे ध्यान एवं तपस्या में लगे रहे। सिद्धार्थ ने अपनी तपस्या की शुरुआत में केवल तिल-चावल खाते हुए थे, लेकिन बाद में उन्होंने तमाम आहार को त्याग दिया था। उनका शरीर सूखकर काँटा हो गया था। वे तपस्या करते हुए छह साल बीता दिए थे, लेकिन उनकी तपस्या सफल नहीं हुई थी।

बुद्ध के शांति हेतु माध्यम मार्ग की खोज के दौरान, एक दिन कुछ स्त्रियाँ उनकी तपस्या करने के स्थान से गुजर रही थीं। उन्होंने एक गीत गाया, जिसमें तारों को ढीला मत छोड़ने और न कसने का उपदेश था। इससे सिद्धार्थ को यह जागरूकता हुई कि नियमित आहार-विहार से ही योग सिद्ध होता है और अति किसी भी बात की अच्छी नहीं। उन्होंने मान लिया कि मध्यम मार्ग ही सही रास्ता है और इसके लिए कठोर तपस्या की जानी चाहिए।उन्होंने विश्व की महानतम सत्य की खोज में अपना जीवन समर्पित कर दिया था।

गौतम बुद्ध की ज्ञान प्राप्ति:

बुद्ध के प्रथम गुरु आलार कलाम थे, जिनसे उन्होंने संन्यास काल में शिक्षा प्राप्त की थी। उनकी आयु 35 वर्ष की थी जब वे वैशाखी पूर्णिमा के दिन पीपल वृक्ष के नीचे ध्यान में थे। इससे पहले बुद्ध ने बोधगया में निरंजना नदी के किनारे पर तपस्या की थी और सुजाता नामक लड़की के हाथों खीर खाकर उनका उपवास तोड़ा था।

एक समय ऐसा आया जब समीपवर्ती गांव में रहने वाली एक स्त्री, सुजाता, को बेटे की इच्छा हुई। उसने अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए एक पीपल वृक्ष से मन्नत मांगी थी। वह सोने के थाल में गाय के दूध की खीर भरकर उस पीपल वृक्ष के पास पहुंची थी जहाँ सिद्धार्थ ध्यान में थे।

सिद्धार्थ ने उस वृक्ष को देवता मानते हुए उसकी पूजा की थी। सुजाता ने सिद्धार्थ को खीर भेंट की और उन्हें आशीर्वाद देकर कहा कि उनकी इच्छा पूरी होगी। उसी रात को सिद्धार्थ ध्यान में लगे और उन्हें सच्चा बोध हुआ।

उस पीपल वृक्ष को बोधिवृक्ष कहा जाता है और उस स्थान को बोधगया कहा जाता है, जो गया के समीप है। सिद्धार्थ को बुद्ध कहा जाने लगा जिससे उन्होंने अपनी शिक्षाओं का प्रचार किया। गौतम बुद्ध ने अपने जीवन के दौरान धर्म और ध्यान के माध्यम से अपनी शिक्षाएं प्राप्त की। उन्होंने अपने जीवन के विभिन्न पहलुओं में अनुभव किए जैसे अध्ययन, समझदारी, संयम, ध्यान आदि और उनके अनुभवों से वे महत्वपूर्ण शिक्षाएं निकालते रहे।

उन्होंने अपने समय में चार वेदों और उपनिषदों के विरोधी धर्म के रूप में बौद्ध धर्म की शिक्षाओं को प्रचारित किया था। गौतम बुद्ध की सिखायी गई शिक्षाएं उनके अनुभवों और ध्यान के माध्यम से प्राप्त की गई थीं जो उनके अनुयायियों द्वारा सम्मानित की जाती हैं।

अष्टांगिक मार्ग:

अष्टांगिक मार्ग बुद्ध के द्वारा बताया गया एक मार्ग है जो मोक्ष या निर्वाण की प्राप्ति के लिए अनुशीलनीय है। इस मार्ग के अनुसार, जीवन में आठ भावनाओं को विकसित किया जाना चाहिए, जो हैं:

  1. सम्यक दृष्टि (Right View) - सत्य का समझना और सत्य की खोज करना।
  2. सम्यक संकल्प (Right Intention) - निःस्वार्थ भावनाओं का विकास करना।
  3. सम्यक वचन (Right Speech) - सत्य बोलना, अनुकूल वचनों का प्रयोग करना और अनापत्ति वचन बोलना।
  4. सम्यक कर्म (Right Action) - धार्मिक और नैतिक कार्यों का अनुसरण करना।
  5. सम्यक जीवन (Right Livelihood) - उचित और नैतिक कार्य करने से अपनी आजीविका कमाना।
  6. सम्यक वाया (Right Effort) - अच्छी भावनाओं को विकसित करने और दुष्कर्मों से बचने के लिए उचित प्रयास करना।
  7. सम्यक स्मृति (Right Mindfulness) - योग्य ध्यान और धारणा के साथ वर्तमान की जांच करना।
  8. सम्यक समाधि (Right Concentration) - ध्यानाभ्यास करने से जब मन एकाग्र होता है तब उससे पूर्णतया उदार और निःशुल्क ज्ञान प्राप्त होता है।

इन आठ भावनाओं के विकास से समझदार, शांति भरा और नैतिक जीवन जीना संभव होता है। इस मार्ग के अनुसार अन्तिम लक्ष्य निर्वाण होता है जो मोक्ष के समान होता है।


उपदेश :

गौतम बुद्ध ने अपने जीवन के दौरान कई महत्वपूर्ण उपदेश दिए थे। उनके उपदेशों में सबसे महत्वपूर्ण उपदेश हैं:

  1. सब्र का महत्व: बुद्ध ने सब्र के महत्व को सार्थक बताया था। उन्होंने कहा था कि सब्र धर्म का मूल है और जो धर्म उसे अपनाता है, वह शांति और सुख का अनुभव करता है।

  2. दुःख का कारण: बुद्ध ने दुःख के कारणों को समझाया था। उन्होंने कहा था कि तृष्णा और अविवेक हमें दुःख का कारण बनाते हैं।

  3. मध्यम मार्ग: बुद्ध ने मध्यम मार्ग को बताया था, जिसे अनुसरण करने से हम दुःख से मुक्त हो सकते हैं।

  4. अनित्यता का समझना: बुद्ध ने अनित्यता के महत्व को समझाया था। उन्होंने कहा था कि सब कुछ अनित्य है और हमें इस बात को समझना चाहिए कि हम इस दुनिया से कुछ नहीं ले जा सकते हैं।

  5. कर्म का महत्व: बुद्ध ने कर्म के महत्व को समझाया था। उन्होंने कहा था कि हमारे कर्म हमारे भविष्य को निर्धारित करते हैं और हमें उन्हें उचित ढंग से करना चाहिए।

  6. समझदारी का महत्व: बुद्ध ने समझदारी के महत्व को समझाया था। उन्होंने कहा था कि हमें अपनी बुद्धि का उचित ढंग से उपयोग करना चाहिए और सही फैसले लेने की क्षमता होनी चाहिए।

  7. आशा के त्याग: बुद्ध ने आशा के त्याग का महत्व समझाया था। उन्होंने कहा था कि आशा हमें दुःख में ही रखती है और हमें उसे त्याग कर देना चाहिए ताकि हम शांति और सुख का अनुभव कर सकें।

  8. सम्यक विचार: बुद्ध ने सम्यक विचार का महत्व समझाया था। उन्होंने कहा था कि हमें सत्य को जानने की क्षमता होनी चाहिए और निर्णय लेने से पहले उचित ढंग से सोचना चाहिए।

ये थे कुछ महत्वपूर्ण उपदेश जो बुद्ध ने अपने जीवन के दौरान दिए थे। उनके उपदेशों का अनुसरण करने से हम अपने जीवन को सफल बना सकते हैं।

गौतम बुद्ध की मृत्यु(महापरिनिर्वाण):

गौतम बुद्ध की मृत्यु, जिसे महापरिनिर्वाण के नाम से जाना जाता है, उनके जीवन के अंतिम दिनों में हुई थी। उन्होंने इस दुनिया को 483 ईसा पूर्व में छोड़ दिया था।

बुद्ध के जीवन के अंतिम दिनों में वे कुशीनागर नामक स्थान पर थे। उन्होंने अपने शिष्यों को उनके साथ रहने का आग्रह किया था और फिर उन्होंने अपने शरीर को धार्मिक तरीके से त्याग दिया। इस माध्यम से उन्होंने महापरिनिर्वाण प्राप्त कर लिया।

उनकी मृत्यु के बाद, उनके शिष्यों ने उनके अशेषों के साथ एक स्मारक बनाया, जो आज भी भारत के बिहार राज्य में कुशीनागर में स्थित है।

गौतम बुद्ध की मृत्यु ने बौद्ध धर्म को एक नई प्रेरणा दी थी। उनके उपदेशों को अनुसरण करने वाले लोगों ने उनके धर्म को जीवंत रखा है और आज भी बौद्ध धर्म दुनिया भर में उपलब्ध है।




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